Feb 24, 2017

बस यहीं हूँ..



हूँ ..

बस  यहीं  हूँ..


कहीं  और  नहीं  जरा  भंवर  में  पड़ी  हूँ...


दरपेश  है आसपास  की  गुज़रती   मसाइलो  से


गाहे  गाहे  घटती  मंजरो  को  देख,


खुद  के  लफ्ज़ों  से  हमारी  ही  बगावत  चलती  है


गो  तख़य्युल  के  साथ-साथ  लफ़्जों  की  पासबानी  होती  है,  


कुछ  खास  तो  करती  नहीं.. .पर


खुद  बयानी  सादा-हर्फी  पर  हमारी  ही  दहशत  चलती  है,


क्या  करु...


खिलाफ़त  जब  आंधियाँ  करती  है  तो  जुरअत  और    बढती  है। 

                                                                                             ©पम्मी सिंह  

(दरपेश -सामने,   मसाइलो -मुसिबत,  तख़य्युल -विचारो, ,पासबानी-पहरेदारी,जुरअत-हौसला )




                                                                                                       

                                

14 comments:

  1. वाह ! बहुत सुंदर ! बहुत सुंदर रचना।

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    1. यह प्रतिक्रिया मिलना मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..

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  2. बहुत ही सुंदर कविता अंतर्मन से लिखी गयी बहुत बहुत बधाई.

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    1. यह प्रतिक्रिया मिलना मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..

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  3. waah bahut hi khoob likha hai ... man ke gahre dwand ko likha hai ...

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    1. आभार रचना पर आपसे मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ प्रोत्साहन देती हैं ।

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  4. बहुत सुन्दर....
    वाह!!

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    1. यह प्रतिक्रिया मिलना तो मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..

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  5. अति उत्तम शब्द चयन पम्मी जी...

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    1. आभार रचना पर आपसे मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ प्रोत्साहन देती हैं ।

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  6. खिलाफ़त जब आंधियाँ करती है तो जुरअत और बढती है।

    ...वाह ....बहुत ख़ूबसूरत अहसास और उनकी सुन्दर अभिव्यक्ति...

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    1. आभार सर.. रचना पर आपसे मिलने वाली प्रतिक्रियाएँ प्रोत्साहन देती हैं ।

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  7. Bahut khoobsoorat rachna....
    Mere blog ki new post par aapka swagat hai

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    1. यह प्रतिक्रिया मिलना तो मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..

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