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Dec 8, 2015

Niyat

नीयत

खामोश  जबानों  की भी  खुद  की  भाषा  होती  है 
कभी अहदे - बफा  के  लिए ,
कभी  माहोल को काबिल  बनाने के  लिए 
मु.ज्तारिब क्या  करु 
   

नीयतनहीं . . 

दुसरे  पर कीचड़ उछाल कर 
ख़ुद को कैसे साफ़ रखू।   
कभी  खुद  के  घोसले ,
कभी दुसरो के  तिनके  
की पाकीज़गी  बनाए रखने  की   ,नीयत
मुख्तलिफ़  होकर  भी 
ख़ामोशी अपनी  मशरुफ़ियत  नहीं 
ज़रा  सी.. 
चंद खुशियों  को महफूज़  रखने की 
नियत्त . . 
                                        - ©पम्मी . . 
( अहदे -वफ़ा -वफादार ,मुजतारिब -शिकायते ,मुख्तलिफ़ -भिन्न,)

17 comments:

  1. यही तो जीवन की उपलब्धि है...बहुत सुन्दर और सटीक चिंतन...

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    1. धन्यवाद,प्रतिक्रया हेतु आभार ..सर

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  2. Replies
    1. प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद

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  3. वाह..., क्‍या बात है। ''खामोश ज़बानों की भी खुद की भाषा होती है'' दिल को छू जाने वाली रचना की प्रस्‍तुति। अच्‍छी बात यह कि आपने अपने कमेंट में अपना यूआरएल डाला। इससे मैं आपके ब्‍लाग पर महज 3 सेंकेड में पहुंच सका। धन्‍यवाद।

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  4. वाह..., क्‍या बात है। ''खामोश ज़बानों की भी खुद की भाषा होती है'' दिल को छू जाने वाली रचना की प्रस्‍तुति। अच्‍छी बात यह कि आपने अपने कमेंट में अपना यूआरएल डाला। इससे मैं आपके ब्‍लाग पर महज 3 सेंकेड में पहुंच सका। धन्‍यवाद।

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  5. जी,धन्यवाद ..

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  7. बहुत सुलझे ढंग से विचारों की प्रस्तुति । हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।

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  8. बहुत सुलझे ढंग से विचारों की प्रस्तुति । हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।

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  9. जी प्रतिक्रिया हेतु आभार..

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